Satire: क्या पार्क में कुत्ता भी नहीं टहला सकता PM? इंडियन पुलिस से ट्रेनिंग ले ब्रिटिश पुलिस

Satire: Can't even a dog walk in the park PM? British police take training from Indian police
 


नई दिल्लीः ये कैसा लोकतंत्र, प्रधानमंत्री अपना कुत्ता तक घुमा नहीं सकता!! ब्रिटेन में सबके लिए लोकतंत्र, पीएम ऋषि सुनक के लिए नहीं! सेंट्रल लंदन के हाइड पार्क में पीएम सुनक अपनी पत्नी अक्षता के साथ अपने लाडले कुत्ते नोवा को घुमाने निकले. अगर लंदन में नोवा को आजादी नहीं मिली तो कहां मिलेगी. अपने ऋषि ने चेन खोल कर चैन से घूमने की आजादी दे दी. तभी पुलिसवाले सूंघते हुए पहुंच गए. कहते हैं कि हाइड पार्क के रूल्स में साफ लिखा है कि बगैर चेन के कुत्ता घुमाना मना है. सुनकर सुनक सकपका गए. फिर नई कंट्रोवर्सी. कुछ दिन पहले कार की पिछली सीट पर बैठ कर एक रील क्या बनाई, उस वक्त भी बेल्ट ना पहनने पर विवाद खड़ा हो गया.


दरअसल, भारतीयों को स्वभाव में लोकतंत्र है, उन्हें बंध कर रहना नहीं पसंद है. ना अपने किसी को बंधन में बांधना पसंद है. चाहे कैसी भी बेल्ट हो. वैसे तो ऋषि सुनक की पुश्तें पाकिस्तान के गुजरावालां से अफ्रीका होते हुए ब्रिटेन पहुंचे थे. लेकिन अगर हिंदू नाम है तो वो भारतीय है. नागरिकता मायने नहीं रखती. और ब्रिटेन का पीएम मनेकि राष्ट्र का गौरव. राष्ट्र से मतलब यहां ब्रिटेन से कतई नहीं हैं. ये बिल्कुल वैसे ही है, जैसे यहूदियों के लिए इज़रायल उनका देश है.

स्वभाव से भी ऋषि हैं PM
भले ही वो दुनिया में कहीं भी रह रहे हों. और फिर ऋषि स्वभाव से भी ऋषि हैं. गौ-पूजा करते हैं. ये अलग बात है कि मांस भक्षण सिर्फ करते ही नहीं, बल्कि अच्छा बनाते भी हैं. साथ ही बीफ इंडस्ट्री को बढ़ावा देते हैं. लेकिन चंदन-टीका लगाते हैं, मंदिर जाते हैं. उन्हें हिंदू दिखने से परहेज नहीं हैं. ऐसे में उनमें भारतीयता के गुण नजर भी आएं तो ऋषि का इंपॉर्टेंस कम नहीं हो जाता.

प्रकृति और जीवों से प्रेम तो हमारे धर्म में किसी भी धर्म से ज्यादा है. कुत्ता तो भगवान कार्तिकेय का वाहन है. अगर खुली हवा में प्रकृति की गोद में बंधनमुक्त हो कर नोवा थोड़ा उछलकूद कर भी लेता, तो क्या फर्क पड़ जाता. लेकिन गोरों के लिए भारतीय आज भी व्हाइटमैन्स बर्डन हैं. चाहे वो उनकी कंट्री का पीएम ही क्यों ना हो.

गोरी पुलिस की नस्लभेदी मानसिकता
हमारे यहां तो भाई कंपलीट लोकतंत्र है. हमारे यहां तो पीएम के रोड शो के बीच से एंबुलेंस निकल जाती है तो खबर बन जाती है. ओ माई गॉड! एंबुलेंस को रास्ता देने पर पीएम को लेकर हमें गौरव महसूस होता है. कुछ भाई लोग तो उनमें देवता और कुछ भगवान तक तलाश लेते हैं. वैसे भी सत्तारूढ़ पार्टी के बहुत से नेता उन्हें सोलहवां अवतार मानते हैं. हमारे पीएम को तो कार के नीचे कुत्ते का पिल्ला आ जाने पर भी पीड़ा होती है.

ऋषि सुनक भी भारतीय हैं. उनसे नोवा का दुख देखा न गया. तोड़ दी कानून की जंजीरें. तुरंत सामने आ गई गोरी पुलिस की नस्लभेदी मानसिकता. ये भी नहीं देखा कि ये कोई देसी कुत्ता नहीं है, लेब्राडोर रिट्रीवर है. ब्रिटेन के ज्यादातर घरों में पाला जाता है. किसी से भी ज्यादा गोरा. और पीएम का वफादार यानि देश का वफादार. नोवा पर एक तरीके से है राष्ट्रीय सुरक्षा का जिम्मा. उस पर सवाल उठाना तो देशद्रोह से कम नहीं. फिर भी गोरे ठुल्ले अपनी हरकतों से बाज नहीं आए. इसीलिए मेट्रोपोलिटन पुलिस को देखते ही नोवा भोंकने लगा. पुलिसवालों के अहम को ठेस पहुंची. लिहाजा सुनक की पत्नी अक्षरा को नसीहत देनी शुरू कर दी.

लोकतंत्र मानवता से बड़ा नहीं
हमारे यहां तो पुलिस व्यवस्था भी बहुत मानवीय है. और लोकतंत्र मानवता से बड़ा नहीं. जब तक जरूरी ना हो हमारी पुलिस एनकॉउंटर नहीं करती. मुंह से ढिचक्यूं-ढिचक्यूं की आवाज निकालती है. अपराधी मारे शरम से मर जाता है. या फिर जीप पलटानी पड़ती है. वो भी इतने स्टाइल से कि पुलिस के ड्राइवर को चोट ना पहुंचे और मुलजिम निपट भी जाए. कई पुलिसवाले तो भावावेश में मंत्री-विधायकजी के पैर तक छू लेते हैं.

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कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जनता का विश्वास जीतना जरूरी है. अगर नेताजी को भरोसा है तो फिर जनता का क्या है. यही लोकतंत्र है, यही डेमोक्रेसी है. ब्रिटिश पुलिस को कुछ दिन इंडियन पुलिस से डेमोक्रेसी की ट्रेनिंग लेनी चाहिए. भेज दीजिए हमारे यहां यूके की पुलिस को, ना इंसान बना कर वापस भेजा तो इंडिया का नाम बदल दीजिएगा.

रील बनाने में ही नप गए ब्रिटिश पीएम
ऋषि सुनक एक दिन लोककल्याणकारी योजनाओं को लेकर अपनी रील बना रहे थे. पिछली सीट पर बैठे थे, मगन हो कर ब्रिटेन की मनरेगा, या पांच किलो अनाज टाइप योजनाओं के बारे में राष्ट्र के नाम संदेश दे रहे थे. रील अपलोड क्या हुई, पुलिस ने सौ पौंड का जुर्माना ठोक दिया. कहा कि सीट बेल्ट नहीं लगाई थी. पूरा का पूरा नैरेटिव बदल दिया. वहां की राष्ट्रविरोधी मीडिया ने ये नहीं देखा कि ऋषि सुनक अपने अर्थशास्त्र के ज्ञान से माली मुश्किल सें फंसे ब्रिटेन को निकालने के लिए कितनी मशक्कत कर रहे हैं. कार में भी चैन से नहीं बैठे हैं. लेकिन बेल्ट नहीं लगाई, इस पर सबने स्टोरी बनाई.

अपने पीएम को बेल्ट से बांध कर रखना भला कहां का लोकतंत्र है. कानून बड़ा या मानवता. जी साहब, कम नहीं होता दस हज़ार का जुर्माना. वो तो घर और ससुराल से मजबूत हैं हमारे ऋषि. वरना तो बोरिस जॉनसन रोज रोना रोते थे कि इतनी तनख्वाह में घर चलाना मुश्किल है, पता नहीं कब पीएम की पोस्ट से निजात मिलेगी. ऋषि की ससुरालवाले इतने मालदार हैं कि चाहे तो पूरा का पूरा हाइड पार्क खरीद कर दे देते. और ऋषि भी पीएम की पोस्ट पर हैं, वो चाहते तो और कुछ नहीं तो नया सेंट्रल विस्टा प्लान तैयार करवा लेते. जिसमें नोवा जैसे सरकारी पेट्स के लिए खास फेसिलिटीज होतीं.

कोई कुछ भी कहे ऋषि सुनक भी हमारे पीएम मोदी की तरह घोर राष्ट्रवादी हैं. उन्होंने भी मोदीजी की तरह किसी से कोई मुरव्वत नहीं बरती. दोनों के लिए नेशन फर्स्ट. सुनक ने तो बीबीसी की डॉक्यूमेंटरी के लिए भी कहा कि वो इससे इत्तेफाक नहीं रखते. और तो और खुद भी प्रवासी होते हुए अवैध प्रवासियों पर रोक के लिए कानून ला रहे हैं. ये अलग बात है कि ये नीति 21 हज़ार अवैध प्रवासी भारतीयों पर भारी पड़ रही है. बताया जा रहा है कि इन अवैध प्रवासियों को रवांडा जैसे तीसरे सुरक्षित देश भेजने की बात हो रही है. सुना है कि ये प्रवासी कह रहे हैं कि रवांडा ही भेजना है तो भारत ही भेज दीजिए.