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भारत-सऊदी अरब संबंध: खरीदार से साझेदार, आर्थिक कॉरिडोर पर बनी सहमति देती है मजबूत रिश्तों की गवाही

 
भारत-सऊदी अरब संबंध: खरीदार से साझेदार, आर्थिक कॉरिडोर पर बनी सहमति देती है मजबूत रिश्तों की गवाही
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Mhara Hariyana News, New Delhi : Saudi Arab के प्रिंस मोहम्मद बिन Salman की भारत यात्रा के दौरान PM नरेंद्र Modi ने Saudi Arab को भारत के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में से एक बताया। यह सच भी है, क्योंकि, आज Saudi Arab, भारत के लिए और भारत, Saudi Arab के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गए हैं।

गौरतलब है कि Saudi Arab भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापार भागीदार (अमेरिका, चीन और यूएई के बाद) है, जबकि भारत, Saudi Arab के लिए दूसरा सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है। यह स्थिति हमेशा से नहीं थी। पहले दोनों देशों के बीच संबंधों का आधार कुल जमा इतना था कि भारत, Saudi Arab से तेल खरीदता था। इन संबंधों में रणनीतिक कुछ भी नहीं था, लेकिन अब चीजें बदल रही हैं।

दरअसल, 2020 में जब Saudi Arab में जी-20 सम्मेलन हुआ था, तब कोविड से पूरी दुनिया जूझ रही थी, उस दौर में भारत ने Saudi Arab का पूरा साथ दिया था। इसी तरह, भारत में हुए जी-20 सम्मेलन में Saudi Arab ने भारत का समर्थन किया। 

आज, चाहे Pakisthan के साथ कश्मीर का मुद्दा हो, या फिर अनुच्छेद-370 को हटाए जाने का मुद्दा हो, Saudi Arab इन्हें अब भारत का अंदरूनी मामला ही बताता है। इससे यह भी पता चलता है कि Saudi Arab और भारत के साथ रिश्ते अब आर्थिक के साथ-साथ रणनीतिक मोर्चे पर भी मजबूत हो रहे हैं।

भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (आईएमईसी) की स्थापना को लेकर हुए समझौता वार्ता भी दोनों रिश्तों के मजबूत होते रिश्तों का ही प्रमाण है। आईएमईसी दरअसल, एक ऐतिहासिक व अभूतपूर्व पहल है, जो वैश्विक व्यापार और कनेक्टिविटी को नया आकार देने की बात करती है। इसमें भारत, संयुक्त अरब अमीरात, Saudi Arab, यूरोपीय संघ, इटली, जर्मनी और अमेरिका शामिल हैं। 

यह कॉरिडोर, दरअसल, इन देशों के बीच व्यापार का एक वैकल्पिक मार्ग है। इससे इन देशों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ेगी और निवेश भी बढ़ेगा। इस परियोजना के तहत पश्चिम एशिया में स्थित देशों को एक रेल नेटवर्क से जोड़ा जाएगा, जिसके बाद उन्हें भारत से एक शिपिंग रूट के माध्यम से जोड़ा जाएगा। फिर इस नेटवर्क को यूरोप से जोड़ा जाएगा।

फिलहाल भारत या इसके आसपास मौजूद देशों से निकलने वाला माल स्वेज नहर से होते हुए भूमध्य सागर पहुंचता है, जिसके बाद वह यूरोपीय देशों तक पहुंचता है। इसी तरह, अमेरिकी महाद्वीप में स्थित देशों तक जाने वाला माल भूमध्य सागर से होते हुए अटलांटिक महासागर में प्रवेश करता है, जिसके बाद वह अमेरिका, कनाडा या लैटिन अमेरिकी देशों तक पहुंचता है। 
इस व्यापक परियोजना से पूरी दुनिया को फायदा मिलेगा। अभी हालांकि यह परियोजना विचार के स्तर पर ही है। पर हर बड़ी परियोजना की शुरुआत विचार से ही होती है।

इस परियोजना को चीन की बेल्ट व रोड पहल (बीआरआई) का कूटनीतिक जवाब भी Maana जा रहा है। इसके जरिये दुनिया के अन्य देशों को यह संदेश भेजा जा रहा है कि अपने विकास Modal को चुनने के लिए आईएमईसी के रूप में बीआरआई का एक और विकल्प मौजूद है। 

चीन की बीआरआई में कई कमियां हैं। यह पारदर्शी नहीं है और देशों की संप्रभुता का ख्याल नहीं करती। इससे विभिन्न देशों के रणनीतिक हित भी प्रभावित होते हैं। बीआरआई की तुलना में आईएमईसी मार्ग से व्यापार में कम समय लगेगा। आईएमईसी से वैश्विक व्यापार को विकल्प उपलब्ध होंगे, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। सैद्धांतिक तौर पर आईएमईसी इसलिए बेहतर है, क्योंकि इससे व्यापार बाधाएं हटेंगी, और व्यापार बेहतर बनेगा।

इसके अलावा, भारत और Saudi Arab ने भारत-खाड़ी सहयोग परिषद (जीCC) मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) वार्ता में तेजी लाने पर सहमति व्यक्त की है, ताकि दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को और मजबूत किया जा सके।  Saudi Arab के साथ अच्छे रिश्ते भारत के लिए जीCC के सदस्य देशों के साथ बेहतर संबंधों का मार्ग प्रशस्त करेंगे। 

जीCC के भीतर कुछ समस्याएं चल रही हैं। इसलिए, उसने भारत के साथ एफटीए की सभी वार्ताएं रोकी हुई हैं। भारत ने भी एफटीए को लेकर हुई वार्ताओं को आगे बढ़ने से रोका है। इसकी वजह यह थी कि इससे पहले भारत के जिन देशों के साथ एफटीए हुए थे, उनमें उसे अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका है।

भारत ने उन सभी की समीक्षा की और उसके बाद सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात के साथ 2022 में कॉम्प्रिहेंसिव इकनॉमिक सहयोग समझौते (सीईपीए) पर हस्ताक्षर किए। सीईपीए संयुक्त अरब अमीरात की ऐसी पहली साझेदारी है और जीCC के क्षेत्र में भारत का इस तरह का पहला समझौता है। 

सीईपीए के शुरू होने के बाद से भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच द्विपक्षीय व्यापार में पिछले साल की तुलना में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अब इसी पैटर्न पर भारत व जीCC के मध्य एफटीए का मार्ग प्रशस्त होने की संभावनाएं बढ़ी हैं। अगर भारत और जीCC के मध्य मुक्त व्यापार समझौता होता है, तो इससे भारत के लिए करों में कमी होगी, या, उसे वरीयता मिलेगी या कर की दरें शून्य होंगी। तीनों ही स्थितियां भारत के लिए फायदेमंद होंगी।

भारत और Saudi Arab के संबंधों में Pakisthan प्रायोजित आतंकवाद भी एक मुद्दा है। 2010 के रियाद घोषणापत्र में Saudi Arab ने पहली बार आतंकवाद को एक गंभीर वैश्विक खतरा Maanा था। मुस्लिमों के लिए पवित्र मक्का Saudi Arab में ही है। और अगर वह आतंकवाद की निंदा करता है, तो इसका संदेश पूरे मुस्लिम समुदाय को जाता है। भविष्य में दोनों देशों के मध्य अंतरिक्ष, सुरक्षा, पर्यावरण व क्रिप्टोकरेंसी के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने की संभावना है।

अंतरिक्ष क्षेत्र में Saudi Arab और संयुक्त अरब अमीरात काफी तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत भी इस क्षेत्र में जिस तरह से विकास कर रहा है, उससे अंतरिक्ष के वाणिज्यीकरण को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, ये देश मिलकर अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। 

अगला संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन यूएई में होना है, जिसके लिए भारत पूरा समर्थन देने के लिए तैयार है। पश्चिम एशियाई देशों के साथ भारत के निरंतर विकसित हो रहे संबंध सहयोग के नए क्षेत्र खोलेंगे। इससे इन देशों में रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ेगी। अगर विश्व में शीतयुद्ध 2.0 जैसी स्थितियां बनती हैं, तो भारत और पश्चिम एशियाई देश मिलकर पूरी दुनिया को एक नई दिशा दिखलाएंगे।