logo

दो दशक में होली मनाने के तरीकों में आ चुका है काफी बदलाव, अब नहीं होती देवर-भाभी के बीच ज्यादा शरारत

पहले की भांति होली पर घरों में नहीं बनते उतने पकवान, बाजार से लाई जाती है मिठाइयां

 
पहले की भांति होली पर घरों में नहीं बनते उतने पकवान, बाजार से लाई जाती है मिठाइयां
WhatsApp Group Join Now

Mhara Hariyana News

सिरसा। बदलते समय के अनुसार होली मनाने के तरीकों में काफी बदलाव आने लगा है। वर्ष 1995 तक तो 10 दिन पहले ही होली का खुमार लोगों के सिर पर चढ़ जाता था। गलियों में बच्चे छतों से गुब्बारे और पानी की बौछार शुरू करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। पहले की तरह उतने पकवान भी नहीं बनते। देवर भाभी की वह शरारत भरी होली भी लुप्त सी हो रही है। 20 साल पूर्व इस त्योहार पर तरह तरह के पकवान घर पर बनाए जाते थे। सूजी का हलवा और खिलमा चावल का अपना ही मजा था। दही भल्ले और गोलगप्पे भी बनाए जाते थे। होली खेलने के बाद परिवार और शाम को आस पड़ोस के लोग भी साथ बैठकर इनका लुत्फ उठाते थे। लेकिन आज ये चीजें घर में कम ही बनने लगी हैं। हर व्यक्ति बाजार पर निर्भर है। घर में बनाने की बजाय बाजार से मिठाई लाकर खाई जाती है। बुजुर्ग कहते हैं कि पहले पर पूरा गांव खेल को बड़े प्यार से खेलता था। उस समय लोग रंग गुलाल कम काला तेल और कीचड़ अधिक डालते थे। महिला कपड़े फाड़कर उनसे ही मजाकिया अंदाज में उनकी पिटाई करती थी। देवर भाभी को रंग से भरे टब में डाल दिया करते थे। भाभी भी देवर पर कीचड़ और काला तेल डालकर अपनी चुन्नी से कोड़े बरसाती थी। खूब शरारत करतीं थी लेकिन समय के साथ ये चीजें न के बराबर हो गई हैं।

घर पर ही हलवा बनाया जाता था

.............................................

70 वर्षीय ओमप्रकाश का कहना है कि अब होली व फाग का स्वरूप पुराने जमाने से बिल्कुल विपरीत है। उस समय घर पर ही हलवा और खिलमा चावल का पकवान बनाया जाता था, अब भारतीय मिठाई की बजाय बाजार से ही मिठाई लाई जाती है। जिनमें घर जैसा स्वाद और प्यार नहीं होता। दिनभर होली व फाग का त्योहार मनाकर सायं के समय में गांव में युवाओं की कुश्ती भी करवाई जाती थी, ताकि गांव को पता लग सके की गांव में किसका लड़का सबसे ताकतवर है। कुश्ती का नजारा भी अलग होता था। इसके लिए भी गांव के युवा पहले से ही तैयारियां करने लग जाते थे।

अब लड़ाई झगड़े का डर रहता है

...............................................

गांवों की बात हो या शहर की पुराने समय में लोग इस त्योहार को प्यार के त्योहार के रूप में मनाते थे, लेकिन अब समय बदल गया है। त्योहार के दिन लोग अच्छाई व बुराई का ध्यान न रखकर द्वेष रखते हैं। जिसके कारण लड़ाई झगड़े का भी डर रहता है। पुराने समय में होली व फाग के त्योहार का अलग ही नजारा व इंतजार होता था, जो लगभग सवा महीने तक चलता था।